अब तो अपनों से ही लगता है डर
अंधेरे से डरा हुआ आदमी जोर-जोर से बोलता है। वह अंधेरे में अपनी ही आवाज सुनना चाहता है। कोई और आवाज उसे और डराती है। झिंगुर की आवाज भी उसे शेर के आने के आहट जैसी लगती है। केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठवबंधन की सरकार का हाल भी ऐसा है। सरकार को अपना भविश्य अंधकारमय नजर आ रहा है।इसलिए वह विरोध की किसी भी आवाज को सत्ता की ताकत से दबा देना चाहती है। वह कार्टूनिस्ट पर देषद्रोह का मुकदमा चलाती है। सुप्रीम कोर्ट को अपने दायरे में रहने की चेतावनी देती है। चुनाव आयोग की बात मानने से इंकार करती है और सीएजी उसे अपने विरोध दल के एजेंट के रुप में दिखाई देता है। यह सरकार विरोधियों से ही नहीं अपने और अपनों से डरी हुई है। ऐसे में इस बात की परवाह किए बिना कि उसकी बात कोई नहीं सुन रहा और उस पर याकीन भी नहीं कर रहा। वह पूरी ताकत से चीख रही है।
कांग्रेस इस समय 1974 की मानसिकता में चली गई है। वह एक बार फिर पार्टी और सरकार को देष का पर्याय मानने लगी है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अक्षम और अति भ्रश्ट सरकार का मुखिया बताने वाले विदेषी पत्रकार उसे देष के खिलाफ शणयंत्र करने वाले नजर आ रहे हैं। इसलिए कांग्रेा के प्रवक्ता संवैधानिक संस्थाओं पर खुलेआम हमला कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन की इसमे मूक सहमति है। सरकार में बैठे लोग सच्चाई को देखने और स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। कोयला घोटाले पर सरकार के सारे तर्क, बचाव और आक्रमणकी सारी दलीलें 2जी घोटाले की याद दिलाती हैं। उस समय भी कांग्रेस ऐसी ही आक्रामक मुद्रा में थी । 2जी से कोलगेट का सफर जीरो लाॅस से नो लाॅस का सफर है। 2जी मामले में उसकी आक्रमकता की आग पर पानी सुप्रीम कोर्ट के फैसलें से पड़ा। कोयला घोटाले में रोज एक नया खुलासा हो रहा है। कांग्रेस के पास तीन तर्क हैं। उक-सीएजी ने दायरे से बाहर जाकर काम किया और घाटे के काल्पनिक आंकड़े दिए। दो-प्रधानमंत्री ने कुछ गलत नहीं किया और आवंटन की नीति भाजपा के मुख्यमंत्रियों की मांग पर अपनाई। तीन-जो भी घोटाला हुआ भाजपा षासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने किया। इसके बावजूद सरकार किसी कोयला ब्लाक के आवंटन को रद्द नहीं करेगी। भाजपा षासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों पर जिस घोटाले का आरोप केन्द्र सरकार लगा रही है उसकी भी जांच कराने को तैयार नहीं है। केद्रीय सर्तकता आयोग के निर्देष पर सीबीआई जो जांच कर रही है सरकार उससे भी असहज महसूस कर रही है।विरोध में उठने वाली हर आवाज को दबाने की कोषिष का ही नतीजा है कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी के खिलाफ देषद्रोह का मामला दायर करना। ऐसा करने वाले भूल गए या जानबूझकर याद नहीं रखा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला है कि राश्ट्रीय प्रतीकों का अपमान कानून की नजर में अपराध नहीं है। सोषल मीडिया पर प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष के बारे में कार्टून बनते हैं तो सरकार सोषल मीडिया को सेंसर करनें का प्रयास करती है। कांग्रेस प्रवक्ता मनीश तिवारी को इस बात पर ऐतराज है कि भारतीय मीडिया टाइम, न्यूजवीक और वाषिंगटन पोस्ट जैेसे विदेषी प्रकाषनों की टिप्प्णियों पर ध्या नही क्यों देता है। इतना ही नहीं भारतीय अर्थव्यवस्था पर अंतराश्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों की रिपोर्ट को वह महत्त्व नहीं देना चाहते। उनके कहने का निहितार्थ यह है कि टिप्प्णियों पर सरकार ध्यान नहीं देती, आप विदेषी मीडिया को नजर अंदाज कीजिए और सब कुछ सामान्य ढंग से चलते रहने दीजिए।
इस सबमें सबसे ज्यादा चिंता की बात संवैधानिक संस्थाओं पर हमले। कांग्रेस पार्टी षायद यह भूल रही है कि संवैधानिक संस्थाएं वही कर रही हैं जो संविधान उनसे अपेक्षा करता है। वह समस्या की महज संदेषवाहक हैं, समस्या नहीं। समस्या कहीं और है। जिन्होंने रामचरित मानस पढ़ा है वे जानते है कि हनुमान7 रावण के पास भगवान का संदेष लेकर गए थे ।रावण नें उनकी पूंछ में आग लगा दी। नतीजा क्या हुआ सबको पता है। अच्छा होगा कि कांग्रेस संवैधानिक संस्थाओं की पूंछ में आग लगाने की अपनी आदत छोड़ दे । वामपंथियों के बारे में कांग्रेसी कहते हैं िकवह अपनी गलती देर से स्वीकार करते हैं । माकपा नेता और पष्चिम बंगाल के पूर्व वित्त मंत्री अषोक मित्र ने हाल ही में स्वीकार किया है कि उनके वामपंथी साथी प्रदेष की जनता को मित्र की बजाय गुलाम समझने लगे थे, लेकिन इतिहास बताता है कि कांग्रेस अपनी गलती से नहीं सीखती । ऐसे में जो सही रास्ता दिखाने की कोषिष करता है वह उसे संदेह की नजर से देखती है।
भ्रश्टाचार और घोटाले के आरोपो के मामले को एक बार छोड़ भी दे तो संप्रग सरकार के सामने समस्याओं का अंबार लगा है। महंगाई बढ रही है, विकास दर लगातार घट रही है, आथिक समानता बढ रही है। विदेषी और देशी निवेश घट रहा है। ढांचागत परियोजनाएं लटकी हुई हैं। विदेष व्यापार घाटे में इजाफा हो रहा है। राजकोशिये घाटा थमने का नाम नहीं ले रहा है। फिर भी सरकार मानने को तैयार नहीं है कि उससे कहीं कुछ गलती हुई है।
कांग्रेस पार्टी और उसके नेतृव्व वाली संप्रग सरकार ऐसे मुकाम पर पहुंच गई है, जहां उन्हें सारा जहां अपना दुष्मन नजर आ रहा है। एक समय था जब पूरी दुनिया के देशो की नजर भारत पर थी । अभी 2010 में अमेरिका के राश्ट्रपति अराक ओबामा ने भारतीय संसद को संबोधित करते हुए कहा था कि भारत उभर नहीें रहा, उभर चुका है। अर्थषास्त्री और ईमानदार प्रधानमंत्री भ्रश्टाचार के आरोपों से घिरे हुए हैं। राजनीति उनका कमजोर पक्ष है यह तो सबको पता था लेकिन अर्थषास्त्र के मौेके पर भी वह नाकाम हो जाएंगे इसकी अपेक्षा षायद ही किसी को रही होगी। तीन साल के छोटे से अर्से में पार्टी और सरकार की सबसे बढा पूंजी , मनमोहन सिंह, गले का पत्थर बनते जा रहे हैं। ऐसा गलता है या तो उन्हें कुछ सूझ ही नहीं रहा कि अब इस झमेले में कैेसे बाहर निकलें या उन्होंने मान लिया है कि चुपचाप रहकर मतदाता के फैसले का इंतजार करें। पार्टी के भले-बुरे से उनके राजनीति जीवन पर कोई आर नहीं पड़ने वाला, लेकिन क्या देष के भले बुरे की चिंता भी उन्हें परेशान कर रही है? इस सवाल पर उनकी ख़ामोशी देश को शायद ही स्वीकार हो।
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